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जैसे ब्रह्मांड में ब्रह्मा निरंतर व्यस्त रहता है ,मैटर एंटीमैटर के प्रजनन से तथा फिर बड़े पदार्थ न्यूट्रॉन प्रोटॉन एटम मॉलिक्यूल आदि जिससे भौतिक जगत निर्मित है और चैतन्य युक्त प्राणियों में अपने मूल स्वरूप समान आत्मा रूप में वास करता है ,इन सभी में ब्रह्मा का स्वयं के प्रति कोई प्रयोजन नहीं है | यह ब्रह्मा के एक प्रकार से निष्काम स्वभाव को दर्शाता है | क्योंकि ब्रह्मा सभी का मूल तत्व है और संपूर्ण ऊर्जा का स्रोत है मनुष्य को भी ब्रह्मा के ही स्वरूप सृष्टि को बनाए रखने हेतु तथा संयमित संतुलित रूप से चलाने हेतु ब्रह्मा भाव से (ब्रह्मा को समर्पित करते हुए ) निष्काम कार्य (किसी आसक्ति या कामना से रहित) करना चाहिए | जिस प्रकार ब्रह्मा भौतिक पदार्थों का मूल तत्व होने पर भी उनसे निसंग है अर्थ पदार्थों को अलग-अलग देखने से उनके 3 गुण (सात्विक राजसिक तामसिक )ऊपर नीचे होते रहते हैं, अतः भौतिक दृष्टि से पदार्थ बदलते रहते हैं किंतु उनका मूल तत्व ब्रह्मा (कुल ऊर्जा का स्त्रोत) सदैव समान रहता है | मनुष्य को भी सदैव ब्रह्मा आचरण करते हुए समान भाव रखना चाहिए | किसी भी इंद्रिय विषय को भाव( राग-द्वेष सुख-दुख मान-अपमान लाभ-हानि पाप-पुण्य) में मस्तिष्क में विभाजित नहीं करना चाहिए | एक अचल निष्काम योगी की भांति सभी देखें चित्र, सुने ध्वनियों,गंध,रस,स्पर्श को एक समान ग्रहण करना चाहिए, उन्हें भावों में प्रिय-अप्रिय सुख-दुख भाग कर के मस्तिष्क में स्मृति कोष में नहीं रखना चाहिए | जैसे आत्मा केवल भावों की अनुभूति करता है और सदैव सम रहता है वैसे ही मनुष्य को यह ज्ञान होते हुए के भौतिक जगत के संबंध/परिवर्तन केवल 3 गुणों में बदलाव हेतु हो रहे हैं और सभी का मूल तत्व तो ब्रह्मा है, इंद्रिय विषयों को समान भाव से ग्रहण करते रहना चाहिए | इससे किसी भी स्थिति में मस्तिष्क में उत्तेजना ,काम, क्रोध, सुख, दुख के भाव उत्पन्न नहीं होंगे और देह दुर्गति की ओर ना जाकर आनंदमई स्वस्थ सबल होगा | इसके अतिरिक्त विषय चिंतन नहीं करना चाहिए मस्तिष्क में उत्पन्न रचनात्मक कोष , स्मृति कोष के विचारों का बार-बार स्मरण कर नहीं सोचना चाहिए | इससे समय व्यर्थ होने के अतिरिक्त विचार विषयों में आसक्ति बढ़ती ही जाती है जिससे कामना उत्पन्न होती है | आगे विषय आपूर्ति ना होने पर या होने पर, फल अपेक्षा से कम या ना प्राप्त होने पर क्रोध ,राग, द्वेष ,सुख-दुख भाव आते हैं | मनुष्य को अपने स्वभाव अनुसार ब्रह्मा को समर्पण भाव रखते हुए कर्म करने चाहिए | जिसे आध्यात्मिक सांख्य मार्ग (आत्मा विषय में चिंतन ब्रह्मांड के नियमों के सिद्धांत का चिंतन )में रुचि हो वह सांख्ययोगी बने और जिन्हें कर्म में रूचि हो वह अपने स्वभाव व रुचिकर कर्म अनुसार निष्काम कर्म योगी बने | 

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