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गीता का आरंभ प्रथम अध्याय 'अर्जुन विषाद योग' से हुआ है जहां महाभारत युद्ध में अर्जुन यह सोच मोह ग्रस्त हो जाता है जिन स्वजनों के साथ वह पला बढ़ा, जिन गुरुजनों से शिक्षा प्राप्त की और भी कई मित्र जिनके साथ निकट संबंध हैं, उनके विरुद्ध शस्त्रों का प्रयोग करेगा, उन्हें मारेगा | पाप-पुण्य, कर्तव्य-अकर्तव्य,नरक-स्वर्ग के चक्कर में उसकी मति भ्रमित हो जाती है, वह किंकर्तव्यविमूढ़ होकर शस्त्र डालकर युद्ध ना करने का निश्चय कर लेता है |अर्जुन के मन के इस मोह रूपी दोष को दूर करने हेतु कृष्ण उसे उपदेश देते हैं जो गीता के  अध्याय  2 से अध्याय 18 तक में वर्णित हैं | मैं अध्यायों में जो महत्वपूर्ण श्लोक हैं उनका यहां उल्लेख करूंगा और उनपे अपनी विचारधारा लिखूंगा | मेरे मत में इन श्लोकों में गीता का अधिकतम सार व प्रमुख संदेश का विस्तार है | मेरे यह विचार स्वामी रामदेव की व्याख्या पुस्तक 'श्रीमद भगवत गीता गीतामृत' पर आधारित है जिसे मैंने पढ़ा है| मैं अपने उल्लेख को इन निम्नलिखित विषयों में विभाजित करता हूं

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