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गीता में वर्णन है ब्रह्मा की प्रकृति चैतन्य भी है | आधुनिक विज्ञान में इस तथ्य को स्थापित करने हेतु कोई प्रयोग नहीं है क्योंकि इसके लिए हमें ब्रह्मा के दृष्टिकोण से उसके भाव को जानना होगा जोकि संभव नहीं क्योंकि ब्रह्मा पर जो भी प्रयोग किए जाते हैं वह उसके अन्य ब्रह्मा अथवा भौतिक पदार्थों के साथ पारस्परिक संबंध (mutual interaction) में होने वाले परिवर्तन के गुणों को नापते हैं , उसमें ब्रह्मा के पारस्परिक संबंध होने के अंतराल में ब्रह्मा की क्या अनुभूति है यह जानना असंभव है | मेरे मत अनुसार ब्रह्मा का अन्य ब्रह्मा के पारस्परिक संबंध के समय जब दोनों के विद्युत और चुंबकीय तरंग एक ही स्थान पर मिलते हैं तब दोनों ब्रह्मा को जो अपनी अपनी अनुभूति होती है वही उनके चैतन्य हैं, उस संबंध के पश्चात वह फिर पुनः अपने सामान्य रूप में गतिमान हो जाते हैं | इस प्रकार से ब्रह्मा में भाव को अनुभूति करने की क्षमता है जिसे उसकी चेतना कहते हैं | यह भाव जो ब्रह्मा अनुभव करते हैं वह संबंध में होने वाले ब्रह्मा के ऊर्जा पर निर्भर है भिन्न ऊर्जा में ब्रह्मा को भिन्न भाव की अनुभूति होती है |  

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