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2.2  अर्थ अध्याय 2 , श्लोक 2

2.2  विषम समय में मन में यह मलिनता ( मोह रूपी दोष) कहां से उत्पन्न हो गई जो सुख नाशक है, असुर आचरण है |

2.11 मृत्यु के बारे में शोक नहीं करना चाहिए | ज्ञानी गतप्राण या जीवित जन के विषय में शोक नहीं करते | 

2.13 जैसे देही के शरीर में बाल्य, यौवन एवं वृद्धावस्था एक के बाद एक आती है, उसी प्रकार पूर्व शरीर को त्याग कर नए शरीर की प्राप्ति भी सहज अवस्था है |

2.14 इंद्रियों के विषयों के साथ विविध संबंध आत्मा को शीत-उष्ण ,सुख-दुख देने वाले हैं ,अनित्य हैं अतः इनको सहन कर अर्थात अप्रभावित रहो |

2.15 सुख-दुख को समान मानने वाले जिस धीर पुरुष को यह इंद्रिय अनुभूतियां व्यथित नहीं करती, वही अमृत तत्व ब्रह्मा को पाने में सक्षम होता है |

2.16 जो नहीं है (असत्) उसका भाव नहीं होता और जो है उस सत् का कभी अभाव नहीं होता |

2.17 वह आत्मतत्व अविनाशी है जिससे संपूर्ण दृश्य पदार्थ समूह व्याप्त है, चैतन्य युक्त है | इस अविनाशी तत्व को विनाश करने की क्षमता किसी में नहीं है |

2.18 इस नित्य ,अविनाशी, अप्रमेय में शरीर के स्वामी आत्मा के जो यह शरीर है, यह सब नाशवान है |

2.20 आत्मा न कभी जन्मता है और ना मरता है | ऐसा भी नहीं है कि एक बार शरीर में विद्यमान होने पर पुनः नहीं होगा, यह अज, नित्य, शाश्वत और पुरातन है |

2.21 जिसने यह जान लिया कि यह आत्मा अविनाशी, नित्य,अज और अव्यय( परिवर्तन रहित ) है, वह मनुष्य कैसे किसी को मार या मरवा सकता है ? 

2.25 आत्मा को अव्यक्त (इंद्रियों द्वारा देखा ना जा सके), अचिंत्य (मन से ना जाना जा सके), अविकार्य (किसी प्रकार का विकार प्रभाव ना करें)  कहते हैं |

2.28 सभी प्राणी प्रारंभ में अव्यक्त ,बीच में देहधारण के समय व्यक्त एवं मरने पर पुनः अव्यक्त हो जाते हैं |देह आत्मा कल्याण के लिए प्राणी का एकमात्र साधन है |

2.39 आत्मा की अमरता और देह की नश्वरता के प्रतिपादन में संख्यानिष्ठा के अनुसार तुझे यह बुद्धि ,ज्ञान बताई है किंतु कर्मयोग की बुद्धि, ज्ञान भिन्न है जिससे तू कर्म करते हुए भी कर्मबंधन त्याग सकेगा |

2.40 निष्काम कर्मयोग के मार्ग में जो कुछ भी एक बार आरंभ हो गया ,उसका नाश नहीं होता | इस मार्ग का थोड़ा सा भी आचरण बड़े भय से सुरक्षा देता है |

2.41 कर्मयोग के मार्ग में निश्चयात्मिका अर्थात कार्य और अकार्य का निर्णय करने वाली बुद्धि एकाग्र होती है, किंतु अस्थिर विचार वाले सकाम मनुष्यों की बुद्धियां बहुत शाखाओं में विभक्त, अस्थिर और अनिश्चयात्मिका होती है |

2.45 त्रैगुण्य के पार जाकर निष्काम हो जा कारण यह त्रिगुणात्मक माया ही सुख-दुख आदि द्वंदो का कारण है और इस मोह माया में निमग्न रहकर व्यक्ति अपनी बुद्धि को स्थिर नहीं रख पाता | अतः सभी द्वंदो से पार जाकर व्यवहार काल में नित्य सात्विक भावो अर्थात एकाग्रता ज्ञान से बना रह |

2.47 कर्म अर्थात कर्तव्य करने में ही अधिकार है, कर्मत्याग में नहीं | कर्तव्य कर्मों के करते हुए भी फलों में अधिकार नहीं,फलासक्ति रहित होकर करना चाहिए |

2.48 पदार्थों एवं विषयों में आसक्ति छोड़कर योग में स्थित अर्थात समत्व में रहकर, कर्म सिद्धि असिद्धि समान मानकर कर्म कर | सफलता असफलता दोनों में एक समान समत्वबुद्धि ही योग है, समत्वबुद्धि से निष्काम कर्म करने की अपेक्षा सकाम कर्म बहुत तुच्छ है |

2.55 जब मनुष्य समस्त कामनाएं त्याग दें और अपने में संतुष्ट हो जाए तब वह स्थितप्रज्ञ होता है |जो दुखों में उद्विग्न मन वाला नहीं होता अनुकूल परिस्थितियों की प्राप्ति में जिसकी तृष्णा नष्ट हो गई हो तथा राग, भय, क्रोध सब नष्ट हो गए हो, जो आसक्तिरहित हो, यथाप्राप्त शुभ अशुभ का आनंद या विषाद नहीं होता वह स्थितप्रज्ञ होता है |

2.59 निराहार पुरुष के विषय इंद्रिय-दौर्बल्य के कारण बाह्य रूप से छूट जाते हैं ,परंतु विषयों की कामना रहती है | परब्रह्मा को प्राप्त करने वाले की सभी कामनाएं स्वत: छूट जाती है | इंद्रियानुगत मन को परब्रह्मा के रस में लगा देना चाहिए |

2.60 प्रमथनशील इंद्रियां यत्नशील विद्वान पुरुष के मन को भी बलात खींच ले जाती है |

2.61 अतैव इंद्रियों को नियंत्रित कर योगयुक्त होकर मत्परायण अर्थ ब्रह्मापरायण होकर ध्यान अवस्थित रह | जिसकी इंद्रियां अधीन हो जाए ,वह स्थिर बुद्धि है |

2.62 विषयों के चिंतन करने वाले मूर्खों कि उनके प्रति आसक्ति बढ़ती जाती है | इस आसक्ति से काम उत्पन्न होता है ,आसक्ति की परिपक्व अवस्था का नाम ही काम है, जिसके होने पर मूर्ख विषयोपभोग के बिना नहीं रह सकता |जैसे ही मूर्ख के काम में बाधा आती है ,क्रोध उत्पन्न होता है |क्रोध से सम्मोह अर्थात मूढ़ता की उत्पत्ति होती है, सम्मोह से स्मृतिविभ्रम होता है, स्मृतिविभ्रम से बुद्धिनाश, बुद्धिनाश से मूर्ख का सर्वनाश हो जाता है |

2.64 जो विधेयात्मा (अंतःकरण को वश में रखने वाला) विषयों में होने वाले राग द्वेष से रहित एवं वशीभूत इंद्रियों द्वारा विषयों का समुचित उपयोग करता है ,वह विषयगत राग-द्वेष मलों से रहित होने से मन की निर्मलता प्राप्त कर लेता है |यही प्रसाद (मन की स्वच्छता) है इसका परिणाम परमानंद है |

2.65 स्थितप्रज्ञ विषयों को ना छोड़ उनमें राग-द्वेष छोड़ देता है, जिससे इंद्रियां विषयों में वर्तते हुए भी मन की शांति भंग नहीं करती, चित्त प्रसन्न रहता है, मन इंद्रियां नियंत्रण में रहती है | जो कुछ वह करता है निष्काम भाव से समत्व बुद्धि से करता है |

2.66 अयुक्त अस्थिर अंतःकरण मूर्ख की बुद्धि आत्मविषयिणी नहीं होती ,विषयोन्मुखी होती है |आत्मविषयक भावना के अभाव में मूर्ख की शांति सुख नष्ट हो जाती है |आत्म-विषयक भावना का मूल आत्मोन्मुखी बुद्धि है, जिसका मूल एकाग्रता है, जिसका मूल रागद्वेषशून्यता है, जिसका मूल विषय चिंतन का त्याग है |

2.67 विषयों में विचरती हुई इंद्रियों में जिससे मन लग जाता है वह इंद्रिय मूर्ख की बुद्धि को हर लेती है | जो इंद्रिय विषयों को सभी ओर से रोके रखें उसे स्थिर बुद्धि कहते हैं |

2.69 जो अध्यात्मसरणि मूर्खों के लिए रात है उसमे कोई संयमी (इंद्रियविषय-पराङगमुख) जागता है और जो मूर्ख सांसारिकता विषयार्जन एवं उपभोग मे सचेष्ट रहता है, वहां ज्ञानी मुनि सोता है |

2.70 स्थितप्रज्ञ जो सिद्धावस्था को प्राप्त हो गया, उसे कर्मत्याग आवश्यक नहीं होता | कामना व फलासक्ति से जो निर्लिप्त है, उसके चित्त की शांति नहीं डिगती |

2.72 ब्राह्मी स्थिति को प्राप्त व्यक्ति किसी मोह से प्रभावित नहीं होता ,अंतकाल में भी स्थिति में रहकर ब्रह्मानिर्वाण अर्थात मुक्ति को पाता है |

3.4 बिना जान केवल कर्म परित्याग से मूर्ख निष्कर्मता रूप सिद्धि को नहीं पाता |

3.6 जो मूर्ख वाक् हाथ-पैर कर्मेंद्रियां रोके हुए मन से उनका चिंतन करते हैं ,वह मिथ्याचारी पाखंडी कहलाते हैं |

3.9 सांसारिक कर्म के कारण ही बंधा हुआ है ,मुक्त होने में कर्म ही बाधक है, किंतु यज्ञार्थ कर्म बंधनकारक नहीं होता | यज्ञकर्म सृष्टि के व्यापार के सुचारू रूप से संचालन में सहयोग देते हैं | 

3.16 जो सृष्टि के धारणार्थ  यज्ञचक्र को आगे नहीं बढ़ाता वह मानो पाप को चाह रहा है अर्थात पापरूपी जीवन है | सांख्यमार्ग से सिद्धावस्था प्राप्त कर चुके व्यक्ति के लिए भी कर्म आवश्यक है, जिससे उसे देख अन्य भी निष्काम कर्म की प्रेरणा लेते रहे तथा मूर्खों में बुद्धिभेद की स्थिति ना हो | यज्ञ का अर्थ आत्मसमर्पण से है ,संपूर्ण संसार एक यज्ञ है ,निष्काम कर्म का जीता-जागता दृष्टांत है | यह सृष्टि-चक्र यज्ञ की भावना, आदान-प्रदान की भावना, स्वार्थ नही अपितु परार्थ की भावना ,आत्मसमर्पण,त्याग सह अस्तित्व की भावना से आगे बढ़ेगा |

3.17 जो मनुष्य केवल आत्मा में ही रत,आत्मा में ही तृप्त और आत्मा में ही संतुष्ट हो जाता है, उसका स्वयं का ऐसा कोई कार्य शेष नहीं रह जाता, जिसका करना आवश्यक हो |

3.18 संसार में कर्म करने से प्रवृत्ति से ना तो उसे कुछ सिद्ध करना है और न ही कर्म न करने से  निवृत्ति से कुछ पाना होता है ,न ही उसे किसी इच्छित वस्तु की प्राप्ति हेतु किसी पर निर्भर रहना पड़ता है |

3.19 यज्ञ भावना से आत्मा को समर्पित कर्म ही आत्मा को परम श्रेय प्राप्त कराते हैं |

3.20 निष्काम भाव से कर्म करने के अतिरिक्त लोकसंग्रह हेतु कर्म करना ही उचित है |

3.21 श्रेष्ठ आत्मज्ञानी योगी जैसा आचरण करते हैं, साधारण व्यक्ति भी उसी प्रकार का आचरण करते हैं |

3.24 यदि मैं कृष्ण ब्रह्मा कर्म ना करूं तो यज्ञचक्र जिससे सृष्टि का व्यवहार चलता है, बंद होने से यह सारा संसार नाश हो जाएगा,अतः ज्ञान प्राप्त होने पश्चात भी ज्ञानी को लोक संग्रहार्थ  कर्म करना आवश्यक है |

3.25 लोक संग्रह की इच्छा रखने वाले ज्ञानी जन को कर्मफल आसक्ति छोड़कर उसी तत्परता से कर्म करना चाहिए  जैसा कर्म में आसक्त मूर्ख करते हैं |

3.26 ज्ञानी कर्मफलसक्त मूर्खों से अकर्मण्यता की भ्रांति उत्पन्न ना करें ,स्वयं श्वेत स्थितप्रज्ञ हो अपने कर्तव्य कर्मों को करते हुए अन्यो को भी सत्कर्मों में प्रेरित करें |

3.27 प्रकृति के सत रज तम गुणों से ही सभी कर्म हुआ करते हैं, अहम्कार से मोहित मूर्ख स्वयं को करता समझता है अर्थात शरीर से संयुक्त आत्मा को एक मानता है, इस प्रकार मूलतः अकर्ता होते हुए भी आत्मा में कर्ता भाव आ जाता है |

3.28 तत्ववित् व्यक्ति जो आत्मा अकर्ता जानता है, बल्कि उससे सम्बद्ध सत्व रज तम गुण ही गुणों में वर्त रहे हैं, प्रवृत्त हो रहे हैं | अतः उनके जाल में नहीं फँसता है |

सच्चा वीर वह नहीं जो केवल युद्ध में शत्रुओं का वध कर दे अपितु निरंतर मन में चल रहे युद्ध का सामना करते हुए आसक्तियों के ऊपर पूर्ण विजय प्राप्त करे |

3.31 जो श्रद्धावान् कृष्ण की बातों में दोष ना ढूंढे और अनुष्ठान करें, वे सभी कर्मों के द्वारा छोड़ दिए जाते हैं अर्थात कर्मफल बंधन उन्हें नहीं बांधता |

3.33 प्राणी प्रकृति स्वभाव अनुसार व्यवहार करता है, हठपूर्वक इंद्रियों की वृति को मारना संभव नहीं है, चतुर उचित संयम द्वारा इंद्रियों की स्वाभाविक वृतियों को लोक संग्रह के कार्य में लगाता है |

3.35 स्वभाव के अनुकूल धर्म ही स्वधर्म है | परधर्म, जो अपने स्वभाव के अनुरूप नहीं है कुछ समय के लिए प्रयत्नपूर्वक अच्छी प्रकार से अनुष्ठित कर भी लिया जाए तो भी अल्पगुण वाला अपना सहज प्राप्त स्वधर्म ही श्रेयस्कर है |

3.37 रजोगुण से उत्पन्न काम और क्रोध मनुष्य का पाप विषय में प्रेरक है |

3.38 काम से ज्ञान ढका हुआ है |

3.40 इंद्रिय,मन,बुद्धि कामरूपी शत्रु का अधिष्ठान या आश्रय है | इंद्रिय संयमित कर ,ज्ञान-विज्ञान नाश करने वाले काम को नष्ट कर दे |

3.42 इंद्रिय शरीर से उत्कृष्ट है, मन इंद्रिय से पर है, बुद्धि मन से, आत्मा बुद्धि से पर है |

4.7  जब-जब धर्म की ग्लानि होती है और अधर्म की प्रबलता हो जाती है अर्थ असुर प्रबल होते हैं तब मैं जन्म लेकर स्वयं को प्रकट करता हूं ;साधु की रक्षा और दुष्टों के विनाश तथा धर्म की स्थापना हेतु में युग-युग में जन्म लेता हूं |

4.18  योगयुक्त ज्ञानी कर्म में अकर्म और अकर्म में कर्म देखता है | मूर्ख हठपूर्वक कर्म छोड़कर( निवृत्ति) अकर्मी होते हुए भी कर्म करता है ;बुद्धि से | योगी कर्म करते हुए( प्रवृत्ति) भी निष्काम होने से अकर्मी होता है |

4.20  कर्मयोगी प्रवृत्ति कर्म एवं उसके फल की आसक्ति छोड़कर जो नित्यतृप्त है और सदा अपने में विद्यमान आत्मानंद से पूर्णतया तृप्त है ,अतः निराश्रय है ,किसी बाह्य आश्रय की अपेक्षा नहीं रखता वह कर्म करते हुए भी अकर्मी रहता है |

4.23 आसक्ति रहित, ज्ञान में जिसका चित्त स्थित हो गया है, ऐसा मुक्त पुरुष यज्ञ (लोक संग्रह) हेतु अपना कर्तव्य करता है |उसके सभी कर्म अकर्म बन जाते हैं | ब्रह्मा, जिसको कर्म से कुछ लेना-देना नहीं ,अनवरत इस यज्ञ-चक्र में स्वयं को व्यस्त रखे हुए हैं, तो मनुष्य को उसका प्रतिनिधि होने हेतु उस यज्ञ में अपने कर्तव्य संपन्न करने चाहिए | 'इदं न मम' ममत्व और स्वार्थ का त्याग करके ब्रह्मार्पणपूर्वक जीवन के व्यवहार का संचालन भी एक महान यज्ञ है |

4.25  परब्रह्मा परमात्मा में ज्ञान द्वारा एकीभाव से स्थित होना ही ब्रह्मारूप अग्नि में यज्ञ के द्वारा यज्ञ को हवन करना है,अर्थ परमात्मा में आत्मा को समर्पित करना व आत्मरूप यज्ञ से परमात्मरूप का यजन करना |

4.26-31  यज्ञ करो अर्थ कर्म करो ,हवन यज्ञ, स्वाध्याय यज्ञ, इंद्रिय नियमन यज्ञ, प्राणायाम यज्ञ ,आहार नियमन यज्ञ, उद्योग यज्ञ |

4.34  मूल रूप में आत्मा परमात्मा स्वभाव एक ही है अर्थ आत्मा परब्रह्मा के मूलतत्व चैतन्य,निर्लिप्तता,पवित्रता एक जैसे ही है |

4.38  ज्ञान के समान पवित्र करने वाला और कुछ भी नहीं है | ज्ञान को निरंतर साधना करते हुए योगसंसिद्धि कालांतर में अपने अंदर ही प्राप्त कर लेता है |

4.42 अज्ञान से उत्पन्न संशय को ज्ञानरूपी तलवार से काट कर कर्मयोग कर |

5.3  जो किसी से द्वेष नहीं करता, जो कोई इच्छा नहीं रखता, जो सुख-दुख लाभ-हानि जय-पराजय राग-द्वेष द्वन्दों से मुक्त है, वह अनायास ही कर्मबंधन से मुक्त है |

5.8 योगयुक्त तत्ववेता को अनुभव होता है आत्मा कुछ नहीं करता | देखने सुनने स्पर्श सूंघने खाने चलने सोने सांस लेने छोड़ने बोलने मल मूत्र विसर्जन हाथों से पदार्थ ग्रहण करने में पलकें खोल झपकने में इंद्रियां अपने विषयों में व्यवहार कर रही हैं |आत्मा सब से निसंग है |

5.11  कर्मयोगी 'मैं कर्म करता हूं' अहंकार बुद्धि का त्याग करके ममत्ववर्जित केवल शरीर,मन,बुद्धि से और केवल इंद्रियों से भी आसक्तिरहित होकर आत्मशुद्धि के लिए कर्म करता है |

5.14  परमात्मा जीवलोक के कर्मों की सृष्टि नहीं करता,न कर्तापन भाव (अभिमान) की करता है ना कर्मों के साथ फल संबंध बनाता है | जीव की प्रकृति स्वभाव ही सब करती है |

5.19  मन साम्यावस्था में स्थित होने पर मनुष्य जन्म-मरण जीत लेता है | साम्यबुद्धि ब्रह्मा के समान निर्दोष और सम रहता है | ब्रह्मास्थिति ही संसार जय है |आत्मस्वरूपी ब्रह्मा अकर्ता है, सब खेल प्रकृति के विकारों का है, इस ज्ञान के अनुरूप जो व्यवहार करता है, वह ब्रह्मास्थ हो जाता है ,मुक्त हो जाता है |वह अक्षय सुख पाता है |

5.29 जो परमात्मा को सभी यज्ञ व तपस्याओं का भोक्ता सभी प्राणियों को मित्र अनुभव करता है ,वही शांति पाता है |

6.5 सभी को अपने आत्मा के उद्धार का प्रयत्न स्वयं करना चाहिए |आत्मा को अवसादग्रस्त ना होने दें अर्थ नीचे ना गिराए |

6.6 जिस जीवात्मा ने मन इंद्रियां सहित शरीर जीत लिया है, उसका आत्मा अपना बंधु है और जो मन इंद्रिय शरीर को नहीं जीत सका संसार में निमग्न उस आत्मा का स्वयं आप ही बाहर के शत्रु के समान उच्छृंखल प्रवृत्तियों से अनिष्टाचरण कर शत्रुता में वर्तता है |

6.7  जो अपने आत्मा को जीत लिया हो और जिसे शांति प्राप्त हो गई हो, वह परमात्मा निरूपाधिक आत्मा शीत-ऊष्ण सुख-दुख राग-द्वेष मान-अपमान में समाहित रहता है अर्थ विक्षुब्ध ना होकर समता में रहता है | ज्ञान विज्ञान से तृप्त आत्मा विकार रहित स्थिति में रहता है| सिद्धावस्था प्राप्त करता है |

6.10 योगी एकांत में चित्त एवं आत्मा का संयमन करें, निष्काम भाव से परिग्रह अर्थ सांसारिक वस्तुओं पर अधिकार भाव का त्याग कर मन को ध्यान से स्थिर करें |

6.12 योगी चित्त इंद्रियां व्यापार रोक मन को एकाग्र कर आत्मशुद्धि हेतु वृत्तिनिरोधरूप योग का अभ्यास करें |

6.18 जब संयत चित्त आत्मा में स्थिर हो जाता है अर्थ किसी भोग की इच्छा नहीं रहती ,तब सर्वकामनाओं से निःस्पृह योगी योगयुक्त होता है |

6.21  योगानुष्ठान से निरूद्ध चित्त इंद्रियातीत अर्थ इंद्रिय ग्रहणशक्ति से परे विद्यमान बुद्धिगम्य सुख अनुभव होता है इस स्थिति में योगी तत्वज्ञान से कभी पृथक नहीं होता | चित्तवृति के निरोध से योग एवं उस निरोध की पूर्ण अवस्था में समाधि स्थित योगी आत्मानंद ब्रह्मानंद होता है | 

6.31  एकता भाव में स्थित जो सभी प्राणियों में स्थित ब्रह्मा आत्मा को भजता है, वह सभी प्रकार से व्यवहार करता हुआ भी परमात्मा परब्रह्मा में ही वर्तता है | उत्कृष्ट योगी आत्मा की उपमा से जो स्वयं को प्रिय अप्रिय है अन्य को भी है ,ऐसी समदृष्टि रखता है |

6.40  योग को थोड़ा सा भी आचरण कभी व्यर्थ नहीं जाता सभी भय से मुक्ति दिलाता है |

6.47  प्रभु अर्पण बुद्धि से किया गया कर्म ही योग के क्षेत्र में आता है अन्यथा वह कर्ममात्र है,न की योग | भजन मानसिक होता है तात्पर्य हृदयंगम कर तल्लीन होना है |

7.5  अष्टधा प्रकृति पृथ्वी जल अग्नि वायु आकाश मन बुद्धि अहंकार अपरा कोटि निम्न कोटि तथा चेतन जीवो को धारण करने वाली आत्मा परा कोटि ब्रह्मा की प्रकृति/प्रकार है |

7.7  परब्रह्मा से उत्कृष्ट ,सूक्ष्म कोई भी नहीं है | धागे में पिरोए मणियों के समान ब्रह्मा की प्रकृतियों से बना सारा ब्रह्माण्ड ब्रह्मा से ओत-प्रोत है, ब्रह्मा के सहारे अवस्थित व सक्रिय है |

7.11 यज्ञचक्र के सुचारू संचालन के लिए मात्र संतानोत्पत्ति हेतु 'काम' धर्म का आवश्यक अंग है |

7.12   सारा संसार ब्रह्मा में स्थित है,ब्रह्मा संसार में स्थित नहीं |

7.13  सत्व रज तम गुणात्मक भावों से मोहित जगत इनसे परे है मूल अविनाशी तत्व ब्रह्मा | माया अज्ञान देहन्द्रियों का धर्म है ,आत्मा का नहीं जो उनसे पर है |

7.14  ब्रह्मा की गुणात्मक माया का कठिनता से अतिक्रमण किया जा सकता है जो बिना ब्रह्मा के शरण में जाए, बिना ज्ञान के असंभव है | जो सभी प्रपंचों को छोड़ ब्रह्मा को ग्रहण कर लेते हैं ,वह माया से पार उतर जाते हैं संसार बंधन से मुक्त हो जाते हैं | माया द्वारा जिनका ज्ञान हर लिया गया हो वह आसुरी भाव युक्त मूढ दुष्कर्मी कभी ब्रह्मा की शरण में नहीं आते ,अनित्य सांसारिक सुखों के जाल में फंस कर कर्तव्य च्युत होकर विनाश को प्राप्त होते हैं |

7.24 अविनाशी अनुत्तम ब्रह्मा के परम भाव को न जानते हुए मूर्ख अव्यक्त को व्यक्त समझते हैं | ब्रह्मा मूल स्वरूप तो निर्गुण निराकार है, मूर्ख माया को ब्रह्मा स्वरूप मान लेते हैं |

7.25  योगमाया अर्थ सत्व,रज,तम गुणों के योग से बनी माया जिससे ब्रह्मा का वास्तविक रूप ढका रहता है |अज, जो पैदा नहीं होता ;अव्यय, जो विनिष्ट नहीं होता ब्रह्मा की सत्ता के दो पक्ष हैं |

8.3  शरीर अंतःकरण के धर्मों से अप्रभावित आत्मा का अपना स्वरूप 'अध्यात्म' है | संपूर्ण नाशवान जगत अधिभूत है नाशवान पदार्थों मे चेतन अधिष्ठाता पुरुष अधिदैव है | आत्मा का स्वभाव अध्यात्म है अथवा शरीर में रहने वाला चेतन तत्व | कर्म,ईश्वर का जगत रचना रूप में तथा मनुष्य का यज्ञ रूप में प्रसिद्ध है | जगत के क्षर भाव शरीर आदि विनश्वर पांचभौतिक पदार्थ,अधिभूत कहे जाते हैं |आत्मा अधिदैवत है | पुरुषोत्तम रूप में आत्मा अधियज्ञ यज्ञ का स्वामी है यज्ञ एवं तप का भोक्ता है |

8.9  प्रयाण काल में पूर्वाभ्यास समाधि से भक्तियुक्त होकर अचल मन से दोनों भ्रुवों के बीच प्राणवायु को भलीभांति रखकर सर्वज्ञ पुरातन अनुशासन करने वाले अणु से भी सूक्ष्म पालनकर्ता अचिंत्य पुरुष आत्मा का जो स्मरण करता है, वह उसी को प्राप्त होता है |

8.17  कृत-सत्,त्रेता,द्वापर,कलि युगों का महायुग होता है |1000 महायुगों का ब्रह्मा का 1 दिन होता है, 1000 महायुगों की रात्रि | दिन प्रारंभ होने पर अव्यक्त (सूक्ष्म प्रकृति) से सब व्यक्त (स्थूल) पदार्थ निर्मित होते हैं ,रात्रि होने पर उसी पूर्वोक्त अव्यक्त में व्यक्त पदार्थ विलीन हो जाते हैं |

महायुग= 432000 वर्ष

कल्प ,ब्रह्मा दिन= 4 अरब 32 करोड वर्ष

8.20  अव्यक्त प्रकृति 7 तथा इससे पर उत्कृष्ट सनातन अव्यक्त परब्रह्मा है उस अव्यक्त को अक्सर कहते हैं परम गति सर्वोच्च अवस्था की प्राप्ति कहते हैं |

9.4 अव्यक्त निराकार परमात्मा द्वारा सारा जगत व्याप्त है |सब भूत ब्रह्मा पर स्थित है, किंतु असंसर्गी ब्रह्मा किसी में अवस्थित नहीं | ब्रह्मा का आत्मा स्वरूप भी भूतों में स्थित नहीं है | वह सबसे असंग है |

9.6 व्याप्त जगत अव्यक्त शक्ति का ही रूप है ,व्यक्त जगत के गुण-धर्म उस अव्यक्त में नहीं है अर्थ भूतों के मूल में वह उपस्थित है किंतु व्यक्त पदार्थों के गुणों से उसका कोई संबंध नहीं | जब मनुष्य सृष्टि में रहता हुआ ,सब कर्मों को करता हुआ कर्मों से अलग रहता है ,तब वह राजविद्या राजगुह्य को जान जाता है |

9.7  कल्प की समाप्ति पर प्रलयकाल में सभी भूत त्रिगुणात्मिका अपरा प्रकृति को प्राप्त हो जाते हैं | कल्प के आदि में पुनः उनकी उत्पत्ति होती है | ब्रह्मा की रात्रि उपस्थित होने पर व्यक्त सृष्टि कल्पान्त तक अव्यक्त में विलीन हो जाती है |

9.8  त्रिगुणात्मिका माया द्वारा कर्मों से बंधे हुए भूतों का मैं बार-बार निर्माण करता हूं, जो अपनी प्रकृति के परतंत्र हैं | उदासीन के समान आसीन (स्थिति) व सृष्टि की रचना, पालन व विनाशरूप कर्मों में अनासक्त ब्रह्मा को सृष्टि-निर्माणादि कर्म बांधते नहीं हैं |

9.17 जगत का पिता माता धाता-प्राणियों के कर्मफल का विधान करने वाला ब्रह्मा है, ब्रह्मा जानने योग्य, सबको पवित्र करने वाला है |

9.19  ब्रह्मा ही सत् और असत् है | सत् कारण असत् कार्य ,सत् वर्तमान असत् अतीत व अनागत |

9.22  जो योगी निष्काम भाव से ब्रह्मा का स्मरण कर अपना कर्तव्य पूर्ण किया करते हैं, उनके जीवन-निर्वाह के साधन ब्रह्मा जुटाता है | योगयुक्तों का योगक्षेम ब्रह्मा ही वहन करता है |

9.30  दुराचारी भी अनन्य भाव से ब्रह्मा का भजन करें तो शीघ्र धर्मात्मा बन स्थाई शांति को पाता है | ब्रह्मा का भक्त निश्चित रूप से कभी नष्ट नहीं होता |

10.2  परब्रह्मा सभी प्राणियों देवता महर्षि आदि का आदिमूल है |

10.3  जो मनुष्य ब्रह्मा को अजन्मा अनादि, सभी स्थूल भौतिक पदार्थ, सूक्ष्म अभौतिक भावात्मक अव्यक्त मानस तत्वों का महेश्वर जानता है, वही मोहित ज्ञानी पापमुक्त है |

10.11  ब्रह्मा भक्तों पर अनुग्रह करने हेतु ब्रह्मा उनके आत्मा में प्रविष्ट कर तेजस्वी ज्ञानदीप से अज्ञान रूपी अंधकार को नष्ट करता है | कर्मयोग की जिज्ञासा होने पर आचरण करने से जिस प्रकार पूर्ण सिद्धि की ओर मनुष्य खिंचा चला आता है, वही स्थिति परमस्वरूप के सतत स्मरण और ध्यान से भी प्राप्त होती है |

10.41 ब्रह्मा अपने एक ही अंश-मात्र से संपूर्ण जगत की विशेष रूप से ढृढता-पूर्वक धारण करके स्थित है |

11.7  देह मे ब्रह्मा के विश्वरूप को देखने से भाव है -'यत पिंडे-तत ब्रह्माण्डे' अर्थ जो पिण्ड में है वह ब्रह्मांड में और जो ब्रह्मांड में वही पिण्ड में |

11.17  अक्षर ब्रह्मा की अंतिम ज्ञेय ,विश्व के अंतिम आधार, विकार रहित अव्यय और शाश्वत धर्म के रक्षक है | ब्रह्मा ही सनातन पुरुष है |

11.19  ब्रह्मा का ना आदि है ना मध्य ना अंत |अपने तेज से समस्त जगत को ब्रह्मा का तपा रहा है |

11.32  ब्रह्मा ही काल में लोकों का नाश करने वाला है | ब्रह्मा का संकल्प निश्चित है समय अनुसार सब घटित होगा | प्राणी जगत केवल निमित्त मात्र है |वस्तुतः व्यक्ति अपने कर्मों से मरते हैं |

 

11.55   जो मनुष्य ब्रह्म के लिए कर्म करता है, ब्रह्म को ही परम पुरुष और परम प्राप्तव्य पदार्थ मानता है,भक्ति करता है,आसक्ति मुक्त है, समस्त भूतों के प्रति वैरभाव से रहित है, वह ब्रह्मा को ही प्राप्त होता है | ब्रह्मा के स्वरूप में अनंत श्रद्धा रखकर उसका दर्शन करते हुए, निर्वैर होकर शुद्ध बुद्धि से नियति प्राप्त कर्मों को कर्तव्य रूप निष्काम करते हुए, उस निराकार स्वरूप में एकाकार की भावना रखकर जीवन व्यतीत करें |

12.2  उत्तम योगी निर्गुण और सगुण के समुच्चय स्वरूप ब्रह्मा में मन लगाकर युक्तचित्त होकर परम श्रद्धा से उसकी उपासना स्मरण ध्यान आदि करता है | वह ब्रह्मा को सब में देखता और उसके दृष्टि में व्यक्त और अव्यक्त सब ब्रह्मा ही है | पूर्णयुक्तता स्थिति में योगी प्रत्येक क्षण,कर्म और संपूर्ण अस्तित्व के साथ ब्रह्मा से मिलता है |

12.5 व्यक्त ईश्वर के उपासकों का मत्कर्मकृत्व मत्परमत्व आदि कर्म क्लेशसाध्य नहीं है ,फिर भी अव्यक्त निराकार ब्रह्म में आसक्त चित्त वालों को उसकी उपासना का आग्रह रखने वालों को बहुत ही अधिक क्लेश करना पड़ता है; अव्यक्त उपास्य विषयक स्थिर चित्तवृति कष्ट से सिद्ध होती है; व्यक्त के उपासकों को अवलम्ब मिलने के कारण उसमे मन लगाना सरल होता है|

13.1 मन बुद्धि अहंकार इंद्रियाँ स्थूल शरीर रूप समस्त क्षेत्र का ज्ञाता आत्मा है ;आत्मा क्षेत्रज्ञ है |

13.5 पंचमहाभूत अर्थ पाँच तन्मात्र रूप सूक्ष्म भूत अहंकार,बुद्धि,अव्यक्त प्रकृति,दस इंद्रियां(5 कर्म, 5 ज्ञान),मन, ज्ञानेंद्रियां के विषय ( शब्द ,स्पर्श, रूप ,रस ,गंध); इच्छा ,द्वेष सुख-दुख, शरीर का यह संघात (पिंड) ,चेतना अर्थ प्राण आदि का व्यक्त व्यापार ,धृति अर्थ  व्याकुल शरीर और इंद्रिय आदि जिससे धारण किए जाते हैं, जिसके द्वारा उत्साहित इंद्रियां और शरीर कार्य करने में थकते नहीं ,यह विकारों सहित 'क्षेत्र' का वर्णन है |

13.10  ब्रह्मा में अनन्य अटल भक्ति रखना, एकांत स्थान पर रहना ,जनसमुदाय में अप्रीति; नित्य अध्यात्म ज्ञान में स्थिति, तत्वज्ञान के अर्थ का आलोचन अर्थ अमानित्वादि ज्ञानसाधनों की परिपक्व भावना से उत्पन्न होने वाला जो तत्वज्ञान है  जिसका प्रयोजन संसार की उपरतिरूप मोक्ष है, उसका आलोचन | तत्वज्ञान के फल का आलोचन करने से ही उसके साधनों में प्रवृत्ति होगी |

13.12  ब्रह्मा अनादिमान है | वह न सत् है न असत् |

13.14  ब्रह्मा इंद्रिय रहित है निर्गुण है | स्वभावतः सभी प्रपंचों से अलग है तथापि सर्वभृत्त (सब का भरण पोषण करने वाला है) ;वह गुणों का प्रकाशक है | ब्रह्मा भोक्ता रूप सुख दुख विकार को प्राप्त होने वाला अविद्याग्रस्त जीवदशा में होता है ;अविद्यामुक्त जीवदशा में भोग का प्रकाशक, अविकृत विशुद्ध चैतन्य उसी की उपस्थिति से सब भोग प्रकाशित होते हैं |

13.16  सभी भूतों का उत्पन्न, पालन, विनाश करने वाला ब्रह्मा ही है|

13.20  कार्य  अर्थ देह तथा करण अर्थ इंद्रियां, के उत्पत्ति में प्रकृति कारण है तथा चेतन होने के कारण पुरुष आत्मा सुख-दुख के भोक्तृत्व का हेतु है |

13.24  प्रकृति के गुण ब्रह्मा आत्मा के लिए दृश्य मात्र है, वह उनसे भिन्न उनके व्यापार का साक्षी है ,गुणों से विलक्षण नित्य चेतन आत्मा है |

13.29  ज्ञानी जानता है सब कर्म प्रकृति द्वारा ही किए जाते हैं आत्मा अकर्ता है | केवल प्रकृति के गुण ही गुणों में प्रवृत्त हो रहे हैं |

 आत्मा पुरुष अकर्ता है ,असंग है पर प्रकृति के गुणों के संग वह अपने में कर्तृत्व का आरोप किया करता है| जब अज्ञान नष्ट हो जाता है तो प्रकृति का साथ छूट जाता है और प्रकृति का उसके सम्मुख नाच बंद हो जाता है |यही मुक्ति है, मुक्ति का अर्थ है मायात्मक कर्मों से आत्मा की मुक्ति |

14.3  'महद् ब्रह्मा' ब्रह्मा की प्रकृति ब्रह्मा के लिए जगदुत्पति हेतु योनि स्थानीय है | इस योनि में ब्रह्मा गर्भ स्थापन कर अचेतन प्रकृति को अपने चेतन स्वरूप से जोड़ देता है, जिससे प्रकृति में उत्पन्न क्षोभ से ब्रह्मांड की उत्पत्ति होती है और आगे भूतों का जन्म संभव होता |

14.4  पशु-पक्षी आदि प्राणियों जो जन्मते हैं, वहां भी महदादि विकारावस्थापन्न ब्रह्मा प्रकृति योनि स्थानीय है और ब्रह्मा ईश्वर बीजप्रद रूप है |अर्थ जीवरूप चेतनामयी परा प्रकृति को इस महदादिस्वरूप अपरा प्रकृति के साथ अपने ज्ञानमय संकल्प से संयोजित कर देता है |

14.5  मूल प्रकृति प्रादुर्भूत सत्त्व,रज,तम-यह गुण देह में रहने वाले अव्यय अर्थ निर्विकार आत्मा को देह में बांधते हैं |

14.6  सत्त्व निर्मलता के कारण प्रकाशित करने वाला और दोषरहित है | यह सुख और ज्ञान के प्रति आसक्ति के द्वारा प्राणी को बांधता है |

14.7  रज स्वभाव रागात्मक है, यह तृष्णा के प्रति आसक्ति से उत्पन्न होता है | यह प्राणी को कर्म करने की प्रवृत्ति के द्वारा बांधता है |

14.8  तमोगुण अज्ञान से उत्पन्न होता है | यह मोह में डालता है ,प्रमाद, आलस्य ,निद्रा से प्राणी को बांधता है |

14.16 सात्विक कर्म का फल शुद्ध होता है ,राजसिक का परिणाम दुख और तामसिक का फल अज्ञान |

 

14.19  ज्ञानी समभाव व्यक्ति जब जान लेता है प्रकृति के गुणों के अतिरिक्त दूसरा कोई कर्ता नहीं है, तीन गुणों से परे साक्षीभूत आत्मतत्व को पहचान लेता है, वह ब्रह्मा पा लेता है |

14.22  जो सत्व ,रज और तम के कार्य ,प्रकाश प्रवृत्ति मोह को प्राप्त होने पर द्वेष नहीं करता और प्राप्त ना हो तो आकांक्षा नहीं करता ,वह त्रिगुणातीत होता है |

15.1  वृक्षरुपी संसार का काल आदि से ऊर्ध्व स्थित ब्रह्मा मूल है | ब्रह्मा प्रकृति व विकारों के रूप में नीचे की ओर फैली शाखाएं हैं | विनश्वर होने के कारण यह अश्वत्थ है किंतु प्रवाह से नित्य रहने हेतु अव्यय भी है |

 

15.2   वृक्ष की विविध योनिरूप शाखाएं नीचे और ऊपर फैली है, जो सत्व, रज तम गुणों से वृद्धि करती है, इंद्रियों विषयों की कोंपल फूटी हुई ,मनुष्यलोक में कर्मानुसार बांधने वाली राग द्वेष रूपी जड़े नीचे सांसारिक जाल की भांति फैली है |

15.3  अत्यंत दृढ़तापूर्वक फैली हुई जड़ों वाले वासना ,कर्मबंधन रूप जड़े इस अश्वत्थ वृक्ष को अनासक्ति रूपी दृढ़ शस्त्र से काटकर उस स्थान को ढूंढना चाहिए जहां से फिर लौटना नहीं पड़ता, यह संकल्प करना चाहिए सृष्टिक्रम की पुरातन प्रवृत्ति जिससे उत्पन्न हुई है, उस आदिपुरुष की शरण में है |

15.10  शरीर से उत्क्रमण त्याग करते हुए, शरीर में स्थित तथा प्रकृति के गुणों से युक्त होकर भोक्ता रूप में विषयों का उपभोग करते हुए जीव को मूर्ख अज्ञानी नहीं जानते, ज्ञान रूपी चक्षु वाले विद्वान ही उसका अनुभव करते हैं |

16.4  दंभ (अन्य रूप में प्रकट करना /झूठा दिखावा करना ) ,दर्प (धन रूप आदि का गर्व) ,अतिमान ( वास्तविक योग्यता से अधिक आकलन करना), क्रोध, पारुष्य, कठोर वाणी ,अज्ञान -यह आसुरी संपत्ति जन्मे मनुष्य है |

16.5  दैवी संपत्ति मोक्षदायक ,आसुरी संपत्ति बंधनकारक मानी जाती है |

16.7  असुर प्रवृत्ति और निवृत्ति नहीं जानते |क्या करना क्या नहीं ,नहीं जानते |न सत्य होता ना शुद्ध व्यवहार ,ना श्रद्धापूर्वक सत्कर्मों का अनुष्ठान, न श्रेष्ठ नियमों का पालन |

16.8  जगत निराधार मान भोगी असुर का मूल उद्देश्य नर-नारी-संयोग तथा अपनी कामनाओं की अधिकाधिक पूर्ति मात्र रह जाती है | मानवीय गुण के स्थान पाश्विक गुण रहते हैं |

16.12  सैकड़ों तृष्णाओं के बंधनों में जकड़े कामक्रोधपरायण असुर कामभोगार्थ हेतु अन्यायपूर्वक बहुत धन एकत्रित करने मे प्रयत्नशील रहते हैं |

16.15  मैं संपन्न कुलीन हूं, मैं यज्ञ द्वारा दूसरों को पराभूत करूंगा, दान देकर नाम कमा लूंगा, इस प्रकार अज्ञान मोहित अनेक विचारों संकल्पों में भ्रमित चित्त वाले ,विषयभोगों में डूबे अपवित्र असुर नर्क में गिरते हैं |

16.18  ऐसे अशुभ करने वाले द्वेषी ,नीच लोगों को ब्रह्मा बारंबार असुरी योनि में डालता है |

17.8  आयु ,सात्विक वृत्ति ,बल ,आरोग्य, सुख ,प्रीति की वृद्धि करने वाले रसीले ,स्निग्ध, शरीर में रस आदि के संग घुलमिल कर लंबे समय तक स्थिर रहने वाले, मन को प्रसन्नता प्रदान करने वाले आहार सात्विक प्रिय होते हैं |

17.24  'ओम् तत्सत्' ब्रह्मा का निर्देश किया गया है, दान तप क्रियाएं इस 'ओंकार' शब्द के उच्चारण के साथ ही प्रारंभ होती है |

17.25  तत् नाम से ईश्वर संबोधन का ही सब है ,यह भाव है |

17.26  किसी पदार्थ के अस्तित्व को बताने और साधुता के अर्थ में सत् प्रयोग होता है |

ओम् तत्सत् |

18.2 काम्य कर्मों के न्यास परित्याग को संन्यास और नित्य नैमित्तिक काम्य आदि सभी कर्मों के फल के त्याग को त्याग कहते हैं |

18.4  यज्ञ दान तप कर्मों का त्याग नहीं करना चाहिए, यह पावन अर्थ चित्तशुद्धिकारक होते हैं |

18.7  मोह के वशीभूत होकर कर्तव्य कर्म त्याग 'तामस त्याग' होता है | किसी से सुन कर्ममात्र का फल बंधन है यदि किसी ने शरीर से कर्म करना छोड़ दिया पर मन से कर्म करता रहा तो वह तामस त्याग है |

18.10  त्यागी के सामने शुभ अशुभ या इंद्रियविषय उपस्थित होने पर उसमें द्वेष या क्षोभ का भाव नहीं होता तथा दूसरी और उसके सहज भाव से पुण्य कर्म होने पर उसमें आसक्ति या पुनः आवृत्ति की भावना नहीं होती |

आत्म-अनात्म विवेक अनुसार शरीर, इंद्रिय ,मन ,बुद्धि अनात्मा है तथा जन्म-मरण क्षुधा-तृषा शोक-मोह इनके धर्म है,न की इनको प्रकाशित करने वाला आत्मा के | जो पुरुष शुभ से राग ,अशुभ से द्वेष नहीं करता वही सुशिक्षित सुसंस्कृत है | मेधावी संशयरहित होता है ,वस्तु का अपूर्ण ज्ञान ही संशय उत्पन्न करता है अन्यथा नहीं |

18.17  'मैं करता हूं' ऐसा जिसका भाव नहीं है तथा जिसकी बुद्धि आसक्ति रहित है वह किसी प्रकार के कर्म से बंधनग्रस्त नहीं होता | स्थितप्रज्ञ किसी के अहित करने के बारे में सोच भी नहीं सकता ;सब कुछ समत्वबुद्धि से करता है, बुद्धि विकाररहित होती है |

18.27 विषयासक्त कर्मफलइच्छुक लोभी हिंसात्मक अपवित्र सिद्धि में हर्ष और असिद्धि में शोक से पागल होने वाला राजस कर्ता है |

18.28 अयुक्त ,असावधान, अस्थिर ,उत्साहरहित, चंचल बुद्धि वाला, शिक्षा से रहित,ऐंठ, अनम्र, धूर्त नैष्कृतिक प्रतिशोधी, आलसी ,अप्रसन्नचित्त ,दीर्घसूत्री अर्थ अल्पकाल साध्य कार्य में बहुत विलंब करने वाला तामस कर्ता होता है |

18.37 जो ज्ञान,वैराग्य ,ध्यान साधना का सुख कष्टसाध्य अनभ्यस्त और अननुभूत होने से प्रारंभ में विषतुल्य प्रतीत होता धीरे-धीरे अभ्यास बढ़ने पर परिणाम की दशा में अमृत्तुल्य बन जाता ,अंतर्मुखी बनी हुई आत्मविषयणी बुद्धि की निर्मलता से मिलने वाला वह सुख सात्विक होता है |

18.38 विषयों और इंद्रियों के संयोग से सुख प्राप्त आरंभ में जो अमृत समान किंतु परिणाम में रोगादि जनक होने से विषतुल्य कष्टदायक होता है, वह 'राजस' सुख होता है |

18.39 आरंभ तथा अनुबंध अंत में मोह में फंसाने वाला निद्रा ,आलस्य ,प्रमाद से उत्पन्न 'तामस' सुख होता है |

सच्चा सुख आत्मनिष्ठ होता है ,भौतिक पदार्थों के इंद्रिय संबंधों से प्राप्त नहीं हो सकता | सात्विक सुख अतींद्रिय होता है जिसे बुद्धि द्वारा ही अनुभव किया जा सकता है | बुद्धि ही ऐसा तत्व है जो प्रकृति के त्रिगुणात्मक व्यवहार का भी अनुभव करती है और आत्मस्वरूप ब्रह्मा का बोध भी उससे होता है |

18.46 ब्रह्मा की पूजा व्यक्ति अपने स्वभाव प्राप्त कर्मों द्वारा करता है ना कि पत्र-पुष्प अर्पित कर घंटा निनाद कर | निष्काम भाव से कर्तव्य कर ब्रह्मार्पण कर देना परम सिद्धि प्रदान करता है |

18.47 उत्तमता से संपादित परधर्म की अपेक्षा विगुण (कुछ अल्प गुण वाला) जो स्वधर्म है ,वह प्रशस्त होता है |

18.62  सर्वभाव (ह्रदय मन प्राण आदि) से जो परब्रह्मा की शरण लेता है,उसके अनुग्रह से वह परम शांति और शाश्वत स्थान प्राप्त करेगा |

व्यक्ति के समग्र व्यक्तित्व को अर्थ उसके मन, ह्रदय, प्राण ,शरीर को भगवान के प्रति उन्मीलित हो जाना है | भगवान के ज्ञान से ,भगवत प्रेम ,भागवत संकल्प से भर जाना है, भगवन्मय हो जाना है | भीतर से भी, बाहर से भी भगवान के साथ एक हो जाना है | यही है गीता का सर्वांगपरिपूर्ण योग ,पूर्ण ज्ञानयोग ,पूर्ण भक्तियोग, पूर्ण कर्मयोग | पूर्णयोग की सिद्धि है - भागवत जीवन |

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