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 गीता के अनुसार कृष्ण ने स्वयं को संपूर्ण ब्रह्मांड में व्याप्त ब्रह्मा कहा है | ब्रह्मा स्वरूप आत्मा, जो चेतना युक्त प्राणियों में निवास करता है, प्राणी के मृत्यु पश्चात आत्मा का स्थान (गति) क्या होगा, यह भी कृष्ण (स्वयं ब्रह्मा )तय करता है | इस हेतु ब्रह्मा ही ईश्वर है | संपूर्ण ब्रह्मांड का मूल ,आदि, अंत यह ब्रह्मा जो भौतिक रूप में कृष्ण के अवतार में वर्णित है ,यही ईश्वर है, जानने योग्य है | अतः प्राणी को सभी कर्म ब्रह्मा समर्पण से अपने भीतर बस रहे ब्रह्मा स्वरूप आत्मा के कल्याण हेतु करने चाहिए |

 

क्योंकि आत्मा ब्रह्मा का समूह है,उसमे कई आवृत्तियों (भिन्न ऊर्जाओं) के ब्रह्मा स्थित हैं | मेरे सोच अनुसार उसमें किस आवृत्ति/ऊर्जा के ब्रह्मा (आत्मा के भाग ) शरीर में स्थित होते यह स्थूल शरीर के संरचना पर भी निर्भर है | जैसे सूक्ष्म गुहा (quantum well)  में ब्रह्मा की विशिष्ट आवृत्तियां/ऊर्जा ही स्थिर रह पाती हैं, उसी प्रकार आत्मा भी विशिष्ट स्थूल शरीर में निवास कर सकती है जहां उसके ब्रह्मा समूह की आवृत्तियां गुहा के संग अनुनाद (resonance) में हो |

https://en.wikipedia.org/wiki/Quantum_well

 

गीता में कृष्ण के वचन अनुसार पापी ,दुष्कर्मी ,अज्ञानी असुरों की आत्मा को वह बारंबार असुर देह में जन्म देता है और सात्विक ,ज्ञानी योगी की आत्मा या तो पुनः सात्विक ,ज्ञानी योगी कुल में जन्म लेती अथवा मुक्त हो जाती अर्थ पूर्ण ऊर्जा रूप में ब्रह्मांड में गतिमान होती ,भौतिक जगत के गुहे में बंधे नहीं रहती | इसको मैं इस दृष्टि से देखता हूं जीवन कर्म अनुसार प्राणी के आत्मा की मरण समय में गति जैसी होगी (उसमें ब्रह्मा समूह की जैसी ऊर्जा होगी) उसी गति अनुसार उसकी आत्मा पुनः असुर देह अथवा योगी देह में वास करने में सक्षम होगी | ज्ञानी सत्कर्मी की पवित्र आत्मा में ब्रह्मा की आवृत्ति/ऊर्जाएँ पापी दुष्कर्मी से भिन्न होगी |

 

गीता में यह भी वर्णन है दुष्कर्मी ,पापी ,भोगी असुर संसार को निराधार मान अपने स्वार्थ हेतु सांसारिक भोगों में व्यस्त रहते हैं |कर्मफल, ईश्वर में वह नहीं मानते और अज्ञान से परिपूर्ण पाप कर्म कर उनका सर्वनाश होता है | ऐसी दूषित आत्मा बारंबार असुर देह में जन्म लेते या अधोगति पाकर पशु-पक्षी योनियों में जन्म लेते |

 

निश्चित ही ज्ञानी मुनियों जिनके गहन अध्यात्म विद्या से गीता का संदेश हम पढ़ रहे हैं ,उन्होंने ब्रह्मा को ईश्वर मान संपूर्ण समर्पण भाव से यह अपनी बुद्धि से लिखा है | तर्कशास्त्र (logic) से देखा जाए तो ब्रह्मा/ईश्वर की सत्ता अनुसार आत्मा का प्राणी में वास ,कर्म अनुसार सद्गति दुर्गति और मरणोपरांत की गति, सब उचित है | वैज्ञानिक प्रयोगों से इसे सिद्ध करना यह मनुष्य को विचार कर संभवतः कभी भविष्य में करना है |

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